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Thursday, September 24, 2009

पिंजरे पंखेदार

तरह तरह के पक्षियों के जू में
हरे ,पीले ,सफेद ,लाल तोते
संग बिरंगी चिड़िया
और सब उड़ रहे थे बार बार
अपने अपने पिंजरों की हदों में
सबके पास थे अपनी जरूरत भर पंखे
‘‘ कौन हैं ये जू बनानेवाले ?‘‘ बच्चों ने पूछा
मैं इस सवाल को टाल गया
मैंने कहा:‘‘ वो मोर देखो
जंगल में मोर नाचता है तो कौन देखता है ?
और मैंने देखा है कि नहीं देखा
मैंने मोर केो कभी नाचते पिंजरे में ।

बच्चों ने फिर पूछा:‘‘ हम यहीं क्यों नहीं रहते ?‘‘
रोज आएंगे जू में ,कितना अच्छा लगेगा !‘‘
मुझे अपनी नौकरी याद आयी
बच्चों की पढ़ाई और भविष्य
सहकर्मियों की ईष्र्या और द्वैष
राजनीतिक दबाव और मंहगाई
बजट के पिंजरे फड़फड़ाती आवश्यकताएं,
अपने हांफते हुए अस्थमिक फेफड़ो की दवाई
शिक्षा ,उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के बदलते तेवर
मैं अब किन्हें देखूं ....
बच्चों के सपने या पिंजरों में बंद परिंदे ?
या उन लोगों को
जिनके पिंजरे हैं पंखेदार

जू में बच्चों का देखता हूं तो सोचता हूं
क्या आनेवाली पीढ़ी के पास
पिंजरों को उड़ा सकनेवाले पंखे होंगे
या कभी ऐसी भी दुनिया होगी जहां
पिंरे नहीं होंगे !
10.02.09

Friday, July 31, 2009

आग रहती है घर में


आग रहती है घर में
किसी एक कोने में जलती
सिगड़ी या चूल्हे मंे नहीं
रूप बदलती रहती है वह दिन भर
दिन निकलते ही
खुलती हुई खिड़कियों और
दरवाजों में
चिड़ियों की चहचहाटों से
क्यारियों में बहते पानी में
आंगन बुहारती और पर्दे झटकारती
घर के एक एक कोने से कचरे निकालती
आग जागते हुए अहसास की तरह
चाय की प्यालियों में
भाप सी उभरती है

आग रहती है घर में
घर जो सड़क की भागमभाग ,
शोरगुल ,धूलधक्कड़
बेचैन दिल की तरह धड़धड़ाती हुई
कांपती जमीन से कुछ दूर
औघड़ सा बसा है
सैकड़ों आंख में
करकरी बनकर चुभा है

घर क्या है
चार कमरे हैं
ठीक दिल की तरह
रसोई ,पूजाघर ,बैठक ,
और शयनकक्ष
बिना आग के जो
बिल्कुल महत्वहीन
घर की बाई तरफ
बना रखा है
बगीचा एक छोटा सा
आम ,अमरूद ,आंवला ,मीठी नीम
कुछ मौसमी बेलें
सेम ,तुरई ,बरबटी ,
कुछ मौसमी भटे , भुट्टे , चने ,
फल्लियां ,मैथी ,पालक ,
कुछ सदाबहार मिर्चें ,पपीते ,
किनारे किनारे आंगन में गुलाब ,मोंगरे ,
रजनीगंधा ,हरसिंगार ,अमलतास ,
उन सब में रहती है आग
जैसे वे सब उसमें रहते ह
आग रहती है घर में
और खण्ड खण्ड होकर
बंट जाती है हम सब में
उसमें , इसमें ,
आने जाने वाले जाने अनजाने
जाने अनजानों में
दूधवाले और अखबारवाले में
गैस के सिलिण्डर के लिए भी
झगड़ती है आग
हंसते गुनगुनाते हुए फिर
पतीली में पक जाने के लिए
माचिस को तीली से
रगड़ती है आग

आग जब मौज में आती है
तो चुहल करती है
और शांत होते ही आस्था में
बदल जाती है
आग तर्जन ,वर्जन ,और गर्जन तक
सैकड़ों जिम्मेदारियों में उभरती है
सिर पै चढ़ती है ,
गले में उतरती है
आग जब रूठती है तो
बैठ जाती है एक तरफ
हाथ मलने और
पैर रगड़ने की कवायदें
उसे करती हैं गुलाबी

आग मगर
खरीदी और बेची नहीं जा सकती
आग ऊगती है अपने आप
जैसे ऊगती है
जंगल में तुलसी
और गमले में पलती है
क्योंकि
आग रहती है घर में

हां
आग रहती है घर में

300709/010809
कुमार कौतुहल

Tuesday, July 21, 2009

अंधेरे के जुगनूं


पचासों सालों से दीवाली
नहीं मनी थी उनके घरों में
रहता था शोक वहां
अपने बूढ़े परिवार के साथ
दीवाली के खास दिन
संस्कार उन्हें अपनी चादरें देकर
पैताने सोता था

मां कहती थी और बताते थे भाई भी
कि मैं उस परिवार का
पचासों साल बाद जलनेवाला दिया हूं
पचासों साल बाद होनेवाली पूजप हूं
पचासों साल बाद फूटनेवाला फटाखा हूं
ढेरों आंधियां चलीं ,गर्मी तपी
बारिसों में भीगे कितने साल
कितनी फूंकों में मैं आजमाया गया
स्नेह सब तरफ सूखता रहा
मैं अपने अंदर के गुबार के भरोसे
गैस के चूल्हों की तरह जलते रहा
मगर एक दिन संयोग से
दीवाली की पूजा के बाद
मेरे ज्येष्ठ अग्रज बुझ गए
एक द्वैष जो प्रतीक्षित था मुझे बुझाने
वह रोया भी और खुश भी हुआ
बोला ‘‘ अब दिये नहीं जलेंगे फिर पहले की तरह ‘‘
मैंने मुस्कुराकर कहा ‘‘ मैं अभी जिंदा हूं और
मेरे जीते जी नहीं मर सकती दीपावली ‘‘
द्वैष ,ईष्र्या ,दंभ और अहंकार संगठित होकर भी
नहीं बुझा सकते उत्सव के पंक्तिबद्ध दिए
वे मेरे अंदर हैं
अंधेरे के ढेर में जुगनुओं की तरह

डा .रा.रामकुमार

Friday, July 10, 2009

बागवानी-1

गुलाब कट जाता है तब भी
अपनी जड़ें बना लेता है
जमीन के अंदर
उसी मस्ती से फूलता है
जैसे कभी कटा ही नहीं
जबकि फूलों से ज्यादा हैं
उसके जिस्म में कांटे
भोजन बनाने वाली पत्तियां भी
कंटीली हैं जिसकी...
और गुलाब है कि माद्दा रखते हैं
कहीं भी ,कभी भी
ऊग जाने का

बागवानी-2
आज ही पौधों को मोंगरे के
उखाड़कर जड़ से
किया है हमने पंक्तिबद्ध
जगह की सुन्दरता और तरतीबी के लिए
स्थापित हो गए मोंगरे
परिवर्तित जमीन पर भी
खुशी खुशी ।

हम सोच रहे हैं
अभी कुछ दिनों से
यहां से कहीं नहीं जाएंगे अब
अच्छी है यहां आबोहवा ,
शांति है
और सबसे बड़ी बात
जगह छोटी है ,जानी पहचानी है
पहचान है हमारी ।

अजीब बात है
कलमें उगानेवाला आदमी
अपने लिए विकसित नहीं करता
कटकर फिर जी उठने की कला
उसको तो कभी घर फला -
तो कभी शहर ,
वह स्वयं कभी नहीं फला !

बागवानी -3
उलाहना सुनकर
बौराया नीबू और आम भी
एक टोटका था जिसे मैंने आजमाया
इतवार है उस टोटके का दिन कि
अब न फूले बौराए तो काट डालूंगा-
वे बौरा गए
खूब फूले फले तुरई और आम

मगर दफ्तरों में अब भी
बांझ पड़ी हैं फाइलें
उन्हें शर्म नहीं आती नीबू की तरह
आम और तुरई की फलदार
संवेदनशीलता वहां है नदारद
वेतन सरकार की मजबूरी है
और काम के लिए
कलदार वज़न जरूरी है
चाहकर भी मैं उन्हें
नहीं दे सकता ऐन इतवार
कुल्हाडी़ चलाने की धमकी
क्योंकि
उनका इतवार शनिवार से ही
रहता है अनुपस्थित
दफतर की फाइलों से ।

Tuesday, May 19, 2009

हमारा समय

अंधेरे से निकलकर
अलसाई भोर के माथे पर फैले
सिंदूर को पोंछते आता है सूरज
बिल्कुल चुपचाप-
हमारे आसपास।

पूर्वान्ह..मध्यान्ह...अपरान्ह..
समय के परिन्दे के तीन पर ,
तेरे ,मेरे ,उसके ..।
हम सबके किए न किए के
जीवित अभिलेख
रचते हैं इतिहास।

’’ हमारे समय में यह था ,वह था ,
तुम्हारे समय में क्या है ?’’
प्रश्नों की उंगलियां चटखाते उलाहने
कब तक सुनेगा समय...
हमारा समय ,
कब तक जुगालियों के दाने
डालेगा अतीत ?
वर्तमान की चोंच में !
कब तक भोगेंगे हम
अकर्मण्यता का संत्रास ?

व्यतीत के बड़बड़ाते खरखराते
समलय तान के बीच से
अब आने दो नयी तान
अब आए नया राग
अब गाए अपनी ही धुन में
समय... हमारा समय ,
हमारा समय यानी
एक नया आभास ...सप्रयास ।

-कुमार कौतुहल