हवाओं में फिर जादू हुआ है , धूप के पेड़ों से महुआ-सा कुछ चुआ है ,
मेड़ पर बैठाया हुआ है कौतुहल का मंद बच्चा,
अभी ठीक से बांध नहीं सकता वह अपना कच्छा ,
खाट पर बैठी हर औरत-नुमा आकृति को वह अपनी मां समझता है,
हुमककर हुलसता है ,ललककर लपकता है।
एक बिजूका है खेत में ,जो न हंसता है न रोता है,
वह अपने सिर पर औंधाया हुआ घड़ा ढोता है ,
बनाई हुई आंखों से वह कुछ नहीं देखता ,
न अंदर कुछ लेता न बाहर कुछ फेंकता।
एक विषकन्या खेत में चारों तरफ घूमती है,
अनचाहों को उखाड़ती है, चाहे हुओं को चूमती है,
जिन्हें उखाड़ती है वे अदृश्य हो जाते हैं,
जिन्हें चूमती है वे जागते हुए सो जाते हैं ,
एक बुढ़िया बो रही हैं खेत में रहस्यमय सन्नाटा ,
अपनों के लिए मुनाफ़ा, दूसरों के लिए घाटा ,
सम्मोहित भीड़ केवल देखती है तमाशा,
बुढ़िया ने नये सिरे से नए जमूरों को है तराशा,
ताश के खेल की तरह हर पत्ता है हुक्म का गुलाम,
सर्कस के सारे शेर विदूषक हैं, कोई नहीं गुलफाम।
डरोगे तो नहीं अगर मैं एक सच बताऊं ?
अगर मुम्हें जादू की इस नींद से जगाऊं ?
दोस्तों ! वक़्त एक अंधेरी कोटरी में बंद है,
केवल वह स्वप्न देखें इसके सारे प्रबंध हैं ,
इस अंधेरी कोठरी में फैला है उजाले का भ्रम ,
बूढ़े रोशनदान को करना नहीं पड़ता कोई भी श्रम ,
बांट रहे हैं सोए हुए लोगों को पेड़े ,
बूढ़े रोशनदान के ज़रिए -खानदानी जादूगर थपेड़े।
हम कहां हैं ,कहां जा रहे हैं ? पूछना मत,
तुम अब नहीं लगा पाओगे कोई भी जुगत ,
तमाशबीन भीड़ फेंक चुकी है अपना पांसा ,
और समय का शकुनी चिल्ला रहा -’’वह फांसा, वह फांसा !’’
-कुमार कौतुहल . दि.270509
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Tuesday, May 26, 2009
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